Tuesday, May 28, 2013

अब ऑखें दूर तलक तरसती है .




अब ऑखें दूर तलक तरसती है ..
साहिल के माथे सहरा रखती है.

दरिया पार की ख्वायिस थी जिन्हे
आज वही दरिया बीच बसती है..
हमें इनकार नही कभी उनकी वफा से.
डर था कि वो बिन बादल जो बरसती है..
पनघट की सखी गागर जो फोड दे.
तो कुँए की रूह तक कॉप उठती है..
जमीन मेरी पर हक आज भी उसका है..
देखो जिंदगी आगे ओर क्या क्या रचती है..

                            


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