मध्य धरा से धुरी धरा तक
अम्बर से पाताल किला तक..
अम्बर से पाताल किला तक..
नदी नीर के अधीर तत्त्व तक..
गागर में सागर के महत्त्व तक.
अब पग पग पे नाम तुम्हारा है..
अपनाओ या ठुकराओ बस इतना काम तुम्हारा है
चहूओर के दिशा जगत तक..
गिरि के निचले गुप्त शिखर तक.
पवन के मचले विचलित तन तक..
पेडो की पत्ति के पग तक.
अब हर साख पे नाम तुम्हारा है..
अपनाओ या ठुकराओ बस इतना काम तुम्हारा है
भोर से शाम की प्रत्येक किरण तक..
कम्पन के चँचल से स्वर तक..
चिड़िया के चह चह के कथन तक.
बीज से अँकुरित धान खेत तक..
हर उगते प्रेम बीज पे नाम तुम्हारा है..
अपनाओ या ठुकराओ बस इतना काम तुम्हारा है
सावन की बूँद से साकार स्वप्न तक.
खुलती जुबानो के आघात अर्थ तक..
रात को दौड लगाती भोर तक..
सन्नाटो के स्वर के शोर तक.
हर स्वर स्वर पे नाम तुम्हारा है.
अपनाओ या ठुकराओ बस इतना काम तुम्हारा है

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