थाल भोजन का सजा है पर स्वाद ये कैसा है..
कितना भी खालू फिर भी उदर खाली सा रहता है
रिमझिम सावन, पेडो पर लटकते झूले
रिमझिम सावन, पेडो पर लटकते झूले
बस यादें है..
है घनघोर घटा मन में कौधे बिजली
है घनघोर घटा मन में कौधे बिजली
पर मन का मयूर कब नाचे
बस बातें है..
तालाब के किनारे वो ठण्डी हवा का सहलाना
बस यादें है
है हवा पर वैसी नहीं
इसमे मन लगता क्यूँ नहीं.
तब नीम के पेड़ के नीचे टपकती निबोई को लेकर मित्रों से बेवजह झगडना
बस यादें हैं
रेत के टीले पर मदमस्त मस्ताना माहौल बनाना
बगल के गॉव की छोरी की यादे दिलाना..
मन कुर्सी पर बैठे - बैठे मन मचलने लगता हैं..
थाल भोजन का सजा है पर स्वाद ये कैसा है..
कितना भी खालू फिर भी उदर खाली सा रहता है
गॉव की मिट्टी की सुगंध तलबो में अब नहीं
खेतों में टहलते - टहलते गिरे बेरो ठेर अब नही..
गॉव में जहॉ भी जाता पर कोई पराया नहीं
यहॉ सब तरफ भीड ही भीड है पर कोई अपना नहीं
अब दिमाग उदर की क्षुदा मिटाने के लिए
हर एक से स्वार्थ सिध्द करता है
कितना भी कमॉलू अर्थ फिर भी मन निर्थक सा रहता है..
थाल भोजन का सजा है पर स्वाद ये कैसा है..
कितना भी खालू फिर भी उदर खाली सा रहता है

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