Tuesday, May 28, 2013

अब ऑखें दूर तलक तरसती है .




अब ऑखें दूर तलक तरसती है ..
साहिल के माथे सहरा रखती है.

दरिया पार की ख्वायिस थी जिन्हे
आज वही दरिया बीच बसती है..
हमें इनकार नही कभी उनकी वफा से.
डर था कि वो बिन बादल जो बरसती है..
पनघट की सखी गागर जो फोड दे.
तो कुँए की रूह तक कॉप उठती है..
जमीन मेरी पर हक आज भी उसका है..
देखो जिंदगी आगे ओर क्या क्या रचती है..

                            


बस इतना काम तुम्हारा है



मध्य धरा से धुरी धरा तक
अम्बर से पाताल किला तक..
नदी नीर के अधीर तत्त्व तक..
गागर में सागर के महत्त्व तक.
अब पग पग पे नाम तुम्हारा है..
अपनाओ या ठुकराओ बस इतना काम तुम्हारा है

चहूओर के दिशा जगत तक..
गिरि के निचले गुप्त शिखर तक.
पवन के मचले विचलित तन तक..
पेडो की पत्ति के पग तक.
अब हर साख पे नाम तुम्हारा है..
अपनाओ या ठुकराओ बस इतना काम तुम्हारा है

भोर से शाम की प्रत्येक किरण तक..
कम्पन के चँचल से स्वर तक..
चिड़िया के चह चह के कथन तक.
बीज से अँकुरित धान खेत तक..
हर उगते प्रेम बीज पे नाम तुम्हारा है..
अपनाओ या ठुकराओ बस इतना काम तुम्हारा है


सावन की बूँद से साकार स्वप्न तक.
खुलती जुबानो के आघात अर्थ तक..
रात को दौड लगाती भोर तक..
सन्नाटो के स्वर के शोर तक.
हर स्वर स्वर पे नाम तुम्हारा है.
अपनाओ या ठुकराओ बस इतना काम तुम्हारा है

कहॉ चॉदनी चॉदी सी है.







आज भी ह्र्दय में तेरी साँसे की सरारत सी है....
अधरो से बुझाई जो प्यास अधरो पे बाकी सी है.
धड़कनें थाम लें आज भी गर तू जरा देर साथ हो..
तेरे हाथों की हल्की सी छुअन मेरे बालों में बाकी सी है..

तेरे केशुओ में छिपकर वो सोना, वो नीँद आधी सी है.
.
तेरी लबो‍ तक आयी जो बात, वो बिन कहे सुनी सुनाई सी है..
नदी के बीच तेरे हाथो को थामना अब थमी वो पुरवाई सी है..
रात भर चॉद को देखा पर अब कहॉ चॉदनी चॉदी सी है.
                                         

उदर खाली सा रहता है


थाल भोजन का सजा है पर स्वाद ये कैसा है..
कितना भी खालू फिर भी उदर खाली सा रहता है

रिमझिम सावन, पेडो पर लटकते झूले
 
बस यादें है..
है घनघोर घटा मन में कौधे बिजली 
पर मन का मयूर कब नाचे
बस बातें है..

तालाब के किनारे वो ठण्डी हवा का सहलाना
बस यादें है
है हवा पर वैसी नहीं 
इसमे मन लगता क्यूँ नहीं.
तब नीम के पेड़ के नीचे टपकती निबोई को लेकर मित्रों से बेवजह झगडना
बस यादें हैं
रेत के टीले पर मदमस्त मस्ताना माहौल बनाना
बगल के गॉव की छोरी की यादे दिलाना..
मन कुर्सी पर बैठे‌‌‌ - बैठे मन मचलने लगता हैं..

थाल भोजन का सजा है पर स्वाद ये कैसा है..
कितना भी खालू फिर भी उदर खाली सा रहता है

गॉव की मिट्टी की सुगंध तलबो में अब नहीं
खेतों में टहलते ‌‌- टहलते गिरे बेरो ठेर अब नही..
गॉव में जहॉ भी जाता पर कोई पराया नहीं
यहॉ सब तरफ भीड ही भीड है पर कोई अपना नहीं
अब दिमाग उदर की क्षुदा मिटाने के लिए
हर एक से स्वार्थ सिध्द करता है
कितना भी कमॉलू अर्थ फिर भी मन निर्थक सा रहता है..

थाल भोजन का सजा है पर स्वाद ये कैसा है..
कितना भी खालू फिर भी उदर खाली सा रहता है

Sunday, May 12, 2013

हुआ तो क्यू..




मुसाफिरो का ठिकाना तय ये हुआ तो कब
शहर में अ‍ॅधेरा होना तय ये हुआ तो कब
जमी ऑखों से दूर् जाती जा रही तो क्यू 
सब तरफ उधल पुथल फिर खामोशी तो क्यू
साखो से उडी चिड़िया भी चुप सी उडी तो क्यू
अब धान चुराऊ तो किसका ये सब हुआ तो क्यू
सुरज भी उगना नहीं चाहे ये हुआ क्यू
अ‍ॅधेरा तो पहले से था फिर सब का चेहरा ये ढका हुआ तो क्यू..

Monday, May 6, 2013

ऐसा वर देना


हे सरस्वती मईया मुझे ऐसा वर देना   
मै भक्त बनूँ तेरा मुझे ऐसा वर देना....

दिन रात करूँ भक्ति मै करूँ भक्ति
मुझे अपने चरणो का तू दास बना लेना ..

मॉ कई उपासक तेरे उनकी क्या गिनती है
उनकी गिनती में मुझको भी मिला लेना....

तेरी महिमा को मईया सब वेद सुनते है
इन वेदो का अल्प ज्ञान मुझको भी करा देना....

तेरे सिर पर मुकुट विराजत हाथों में वीणा है
इस वीणे के सुर-ताल मुझको भी सिखा देना....

हे सरस्वती मईया मुझे ऐसा वर देना 
मै भक्त बनूँ तेरा मुझे ऐसा वर देना....