ओ सूर्य की प्रथम किरण
ओ सब के मुखमण्डल की लाली
तुम आती कहॉ से
कहॉ को जाने वाली...
सुना है तुम दूर पर्वत की गोद में छिपती हो.....
तो क्या कल--- कल बहने वाली नदियों के स्वर सुनती हो..
वहॉ भी जीव तुम्हे अपना ताज बनाता है
तुम दिखो उन्हे तो तुमको शीश झुकाता है
हम तो तुमको अपना भविष्य मानते है
हर दिन दिखने पर स्वयं को तृप्त मानते है
तुम कितने सोते हुओ को जगाँती हो
उनको उनकी लक्ष्य राह दिखलाती हो
स्पर्श हुआ तन को तेरा, तो शक्ति प्राप्त हुई..
तब जीव को अंधकार से मुक्ति प्राप्त हुई.
बगियॉ में तितलियॉ स्वागत गान करें
भवॅरे भी गुन गुन गूँजन गान करें..
पर्वत की बर्फ़ जो सर्दी से अकड रही है
तेरे आते ही स्वयं नदी में बदल रही है
वो चिडिया का प्रथम स्वर ,सब मोहित होते उससे
ओ प्रथम किरण की लाली, सब मोहित होते तुझसे .
