Thursday, July 18, 2013

हर बार कि तरह

वो तब भी खुश था वो अब भी खुश है हर बार कि तरह..
हमें किसी अपने ने ही ठगा है इस बार भी हर बार कि तरह..

वो दर्द और ये दर्द अब शिकायत नही ,आशिक़
हमें किसी अपने ने ही ज़ख्म दिया है हर बार कि तरह..

साहिल तक फासलो के सिमटने की दुऑ करने लगे,आशिक़
हमें किसी अपने ने ही भॅवर में फँसाया है हर बार कि तरह..

दिल के उपवन में लताये दरख़्त से लिपटकर दौलत कमाने लगी,आशिक़
पर फिर किसी अपने ने ही इस वन में चिंगारी सुलगाई है हर बार कि तरह..

वो सब अता करता चला गया महज मेरे कहने पर ,आशिक़
पर फिर किसी अपने ने ही मेरी तिजोरी चुराई है हर बार कि तरह..

मैं यूँ ही तो होश में इतना सच नही बोलता,आशिक़
फिर किसी अपने ने ही मेरे पानी में शराब मिलाई है  हर बार कि तरह..

Thursday, June 13, 2013

प्रथम किरण......





ओ सूर्य की प्रथम किरण
ओ सब के मुखमण्डल की लाली
तुम आती कहॉ से
कहॉ को जाने वाली...

सुना है तुम दूर पर्वत की गोद में छिपती हो.....
तो क्या कल‌‌--- कल बहने वाली नदियों के स्वर सुनती हो..

वहॉ भी जीव तुम्हे अपना ताज बनाता है
तुम दिखो उन्हे तो तुमको शीश झुकाता है

हम तो तुमको अपना भविष्य मानते है
हर दिन दिखने पर स्वयं को तृप्त मानते है

तुम कितने सोते हुओ को जगाँती हो
उनको उनकी लक्ष्य राह दिखलाती हो

स्पर्श हुआ तन को तेरा, तो शक्ति प्राप्त हुई..
तब जीव को अंधकार से मुक्ति प्राप्त हुई.

बगियॉ में तितलियॉ स्वागत गान करें
भवॅरे भी गुन गुन गूँजन गान करें..

पर्वत की बर्फ़ जो सर्दी से अकड रही है
तेरे आते ही स्वयं नदी में बदल रही है

वो चिडिया का प्रथम स्वर ,सब मोहित होते उससे
ओ प्रथम किरण की लाली, सब मोहित होते तुझसे .

Tuesday, May 28, 2013

अब ऑखें दूर तलक तरसती है .




अब ऑखें दूर तलक तरसती है ..
साहिल के माथे सहरा रखती है.

दरिया पार की ख्वायिस थी जिन्हे
आज वही दरिया बीच बसती है..
हमें इनकार नही कभी उनकी वफा से.
डर था कि वो बिन बादल जो बरसती है..
पनघट की सखी गागर जो फोड दे.
तो कुँए की रूह तक कॉप उठती है..
जमीन मेरी पर हक आज भी उसका है..
देखो जिंदगी आगे ओर क्या क्या रचती है..

                            


बस इतना काम तुम्हारा है



मध्य धरा से धुरी धरा तक
अम्बर से पाताल किला तक..
नदी नीर के अधीर तत्त्व तक..
गागर में सागर के महत्त्व तक.
अब पग पग पे नाम तुम्हारा है..
अपनाओ या ठुकराओ बस इतना काम तुम्हारा है

चहूओर के दिशा जगत तक..
गिरि के निचले गुप्त शिखर तक.
पवन के मचले विचलित तन तक..
पेडो की पत्ति के पग तक.
अब हर साख पे नाम तुम्हारा है..
अपनाओ या ठुकराओ बस इतना काम तुम्हारा है

भोर से शाम की प्रत्येक किरण तक..
कम्पन के चँचल से स्वर तक..
चिड़िया के चह चह के कथन तक.
बीज से अँकुरित धान खेत तक..
हर उगते प्रेम बीज पे नाम तुम्हारा है..
अपनाओ या ठुकराओ बस इतना काम तुम्हारा है


सावन की बूँद से साकार स्वप्न तक.
खुलती जुबानो के आघात अर्थ तक..
रात को दौड लगाती भोर तक..
सन्नाटो के स्वर के शोर तक.
हर स्वर स्वर पे नाम तुम्हारा है.
अपनाओ या ठुकराओ बस इतना काम तुम्हारा है

कहॉ चॉदनी चॉदी सी है.







आज भी ह्र्दय में तेरी साँसे की सरारत सी है....
अधरो से बुझाई जो प्यास अधरो पे बाकी सी है.
धड़कनें थाम लें आज भी गर तू जरा देर साथ हो..
तेरे हाथों की हल्की सी छुअन मेरे बालों में बाकी सी है..

तेरे केशुओ में छिपकर वो सोना, वो नीँद आधी सी है.
.
तेरी लबो‍ तक आयी जो बात, वो बिन कहे सुनी सुनाई सी है..
नदी के बीच तेरे हाथो को थामना अब थमी वो पुरवाई सी है..
रात भर चॉद को देखा पर अब कहॉ चॉदनी चॉदी सी है.
                                         

उदर खाली सा रहता है


थाल भोजन का सजा है पर स्वाद ये कैसा है..
कितना भी खालू फिर भी उदर खाली सा रहता है

रिमझिम सावन, पेडो पर लटकते झूले
 
बस यादें है..
है घनघोर घटा मन में कौधे बिजली 
पर मन का मयूर कब नाचे
बस बातें है..

तालाब के किनारे वो ठण्डी हवा का सहलाना
बस यादें है
है हवा पर वैसी नहीं 
इसमे मन लगता क्यूँ नहीं.
तब नीम के पेड़ के नीचे टपकती निबोई को लेकर मित्रों से बेवजह झगडना
बस यादें हैं
रेत के टीले पर मदमस्त मस्ताना माहौल बनाना
बगल के गॉव की छोरी की यादे दिलाना..
मन कुर्सी पर बैठे‌‌‌ - बैठे मन मचलने लगता हैं..

थाल भोजन का सजा है पर स्वाद ये कैसा है..
कितना भी खालू फिर भी उदर खाली सा रहता है

गॉव की मिट्टी की सुगंध तलबो में अब नहीं
खेतों में टहलते ‌‌- टहलते गिरे बेरो ठेर अब नही..
गॉव में जहॉ भी जाता पर कोई पराया नहीं
यहॉ सब तरफ भीड ही भीड है पर कोई अपना नहीं
अब दिमाग उदर की क्षुदा मिटाने के लिए
हर एक से स्वार्थ सिध्द करता है
कितना भी कमॉलू अर्थ फिर भी मन निर्थक सा रहता है..

थाल भोजन का सजा है पर स्वाद ये कैसा है..
कितना भी खालू फिर भी उदर खाली सा रहता है

Sunday, May 12, 2013

हुआ तो क्यू..




मुसाफिरो का ठिकाना तय ये हुआ तो कब
शहर में अ‍ॅधेरा होना तय ये हुआ तो कब
जमी ऑखों से दूर् जाती जा रही तो क्यू 
सब तरफ उधल पुथल फिर खामोशी तो क्यू
साखो से उडी चिड़िया भी चुप सी उडी तो क्यू
अब धान चुराऊ तो किसका ये सब हुआ तो क्यू
सुरज भी उगना नहीं चाहे ये हुआ क्यू
अ‍ॅधेरा तो पहले से था फिर सब का चेहरा ये ढका हुआ तो क्यू..

Monday, May 6, 2013

ऐसा वर देना


हे सरस्वती मईया मुझे ऐसा वर देना   
मै भक्त बनूँ तेरा मुझे ऐसा वर देना....

दिन रात करूँ भक्ति मै करूँ भक्ति
मुझे अपने चरणो का तू दास बना लेना ..

मॉ कई उपासक तेरे उनकी क्या गिनती है
उनकी गिनती में मुझको भी मिला लेना....

तेरी महिमा को मईया सब वेद सुनते है
इन वेदो का अल्प ज्ञान मुझको भी करा देना....

तेरे सिर पर मुकुट विराजत हाथों में वीणा है
इस वीणे के सुर-ताल मुझको भी सिखा देना....

हे सरस्वती मईया मुझे ऐसा वर देना 
मै भक्त बनूँ तेरा मुझे ऐसा वर देना....