Saturday, February 14, 2015

शायरी

तबियत खास मर्ज की वैद्य तय कर नहीँ पाया
पर भानु अब कहॉ वो नाड़ियो वाले वैद्य मिलते है
शिकार किया उसने मेरा चारो तरफ से घेरकर
पता करो भानु रात के जख्म रात ही में कैसे भरते है
सियासत करता है दिल की हुकूमत पर नादान
पर भानु ये वो दरिया है जिसे तैर कर नहीँ डूब कर पार उतरते है
साँसों की उधेड़बुन में खलल सा पड़ गया है
पता करो भानु ये इश्क़ के रेशे कहाँ पर जाकर सुलझते है
रोशनी नहीँ पहुँची अभी तक ज़मी पर सूरज की
चलो भानु अभी तो रात है थोड़ा सा और सोते है
गर रस्ते में रुकावट आये तो क्या रूकेगें हम
नही भानु लक्ष्य है एक रस्ते एक थोड़ेही चलो दूसरा रास्ता पकड़ते है
तेजपन से धरती तपती मॉ प्यारी बोझों मरती
पता लगाओ भानु उनका जो क़यामत के दिन से नहीँ डरते है
वो कहती है कुछ मेरे लिये लिखो तो अच्छा लगेगा
पगली लिखतों दूँ पर इश्क़ होने में कोई दिन थोड़े ही लगते है...

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